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वैचारिक महामारी का आपातकाल

सुना है आजकल वैचारिक महामारी का अघोषित आपातकाल लागू हुआ है जो सीधा हर दिलो - दिमाग को अपनी गिरफ्त में ले रहा है जिसके असर से अब शहर में हर कोई शह और मात का खेल खेल रहा है जो चाय की दूकान पर साथ बैठकर चाय पिया करता था जो अख़बार का एक पेज  मेरे हाथ में और दूसरा पेज उसके हाथ में हुआ करता था आज वही नफ़रत के लिबास को ओढ़ कर घर से निकलता है चाय या अखबार नहीं अब उसे पत्थर प्रिय लगते है जो पत्थर घर बना सकते है या रास्ते अब उन्ही पत्थर से उजाड़ने की इबारत लिखी जाती है उसे शायद किसी ऐसी ही वैचरिक महामारी ने घेर लिया है ये वो महामारी है जिसमें दिमाग भावना शून्य हो जाता है और फिर भाव शून्य मन और शरीर एक रोबोट की तरह काम में लग जाता है जिसे ना खून का रंग पता है ना संबंधों का वो तो महज रोबोट बन अपने स्वार्थी आकाओं के कहने पर  बस कहीं भी कहीं पर भी बिफर  या कहे फट पड़ता है और देखते देखते - आँखों के सामने ही बेगुनाहों की जिन्दगी और उनका घर बार सब इस वैचारिक महामारी की चपेट में खामोश हो जाता है पर फर्क कोई किसी को नहीं पड़ता क्यूंकि आजकल लगभग हर कोई किसी ना किस...

आप तो सजाते हो दिलों को

·                             कोई सजाता है घर तो       कोई सजाता है महफ़िल       पर आप तो सजाते हो दिलों को       कोई नहीं ऐसा       जो हो आपसे बढ़कर ..... ·                             किस्से रोज बनते है       रोज बिगड़ते है       कुछ लोग तो किताबों में भी       स्याही बिना ही छपते है       पर जो लोग अलग होते है       उनके किस्सों पे लोग       किताब लिखते है .... ·                            ये उम्र नहीं जिसपे कुछ लिखा जाये      ये तो जाती बहार है      इस पर क्या ऐतबार किया ...

जिन्दगी ने बहुत कुछ दिया

जिन्दगी ने बहुत कुछ दिया, कुछ मन का और कुछ अपनी तरह का दिया रोज रोज हमने जिन्दगी को जिया ये सोच के जिया कि आने वाला पल बहुत खास होगा ऐसा होगा जहाँ सब कुछ मन का होगा यही आस लिए जिन्दगी रोज रोज प्रयास करती है जिन्दगी मेरी भी सबकी भी एक ही तरह से चलती है सपनो की ऊँची उड़ान हर रोज हमारे अरमान लिए उडती है और सुबह से शाम तक जिन्दगी न जाने कितने अजनबी तूफानों से लडती है आती है जाती है – ना जाने क्या क्या जिन्दगी करवाती है यही है जिन्दगी मेरी भी – तेरी भी – सबकी भी लेकिन फिर भी बहुत खुबसूरत अहसास है जीने का ये जब अपनों से जरा सा भी अपनापन जो मिल जाये मानो तेज दौड़ती जिन्दगी को सुकून की छाँव मिल जाये रिश्तों की महक से फिर जिन्दगी का खिल जाना दिल को असली सुकून देता है हम भी खास है .. ये अहसास देता है 

भारत की महिमा निराली है

राजा डुगडुगी बजाता है जनता को नचाता है ऊँचे ऊँचे वादे करके सस्ते में टरकाता है मन की बात बहुत करता है काम की बात छिपाता है दुनिया का चक्कर लगा कर ढोल बड़े पिटवाता है कभी नोटबंदी है करता कभी जीएसटी में फंसाता है आर्थिक नसबंदी से भ्रस्टाचार को डराता है उत्पादन सब ठप्प पड़ा है और कारोबार हो गया सब चौपट पर राजा जी कहते है विकास हमारा है चौकस न खाऊंगा न खाने दूंगा नारा भी वो देते है लेकिन बस ये नारे है जो जनता को सुनाते है पंडाल के पीछे खाने वाले अब भी भरपूर मजे उड़ाते है बायोमेट्रिक के डंडे से काम सरकारी होने का भ्रम बखूबी जारी है असली लाल फीता शाही का राज अभी भी कायम है   बेटी बचाओ की बात है करते  पर असल में बेटों को बचाते है  “ बेचारा बेरोजगार आज भी उम्मीद से खड़ा है उसी मुकाम पर   जहाँ पर उसे भूतपूर्व राजा ने छोड़ा था” वन नेशन वन टैक्स तो कर ने सके पर “ वन नेशन वन गवर्नमेंट” पर दिल से काम जारी है सारी नदियाँ जुड़ गयी है कागज पर भ्रस्टाचार खतम हो गया वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पर अयोध्या में वर्षो बाद मनी...

लोग कहते है कि सम्मान दीजिये

लोग कहते है कि सम्मान दीजिये हम कहते है की रहने दीजिये क्यूंकि जो जीवन भर न मिला उसका क्या ख्वाब देखना हां पर जो जिन्दगी भर भरपूर मिला ... अपमान अब आदत सी हो गयी है उसके साथ जीने की इसलिए नहीं चाहिए अब कोई दौलत सम्मान की यूँ भी ये दुनिया तो भरी है आडम्बरों से जहाँ कोई कायदा नहीं चलता एक तरह से एक दुसरे को काटो और लोगो को बांटो इसी नियम पर ये संसार चलता है बातें मानवता की दुहाई ईमानदारी की लेकिन असल में सौदा तो चालों और कपट से ही होता है यहाँ कोई देता है तो इसलिए देता है क्यूंकि बदलें में उसको आपसे कुछ और बड़ा लेना होता है रिश्तें भी मंडी की तरह यहाँ बिकाऊ रहते है नोटों की दौलत जहाँ वहीँ ये भी खड़े होते है भले मानस की यहाँ अब किसी को चाह नहीं लोभ और तुच्छ सोच सब पर हावी है अब ऐसे में इस संसार का कोई भी सम्मान किसी प्रपंच से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता और कोई प्रपंच मेरे लिए सम्मान कदापि नहीं हो सकता इसलिए मुझे मेरी गुरुबत ही प्यारी है कमसे कम जैसी भी है मेरी है और किसी और में इसे अपनाने की हिम्मत तनिक भी नहीं है ...... रवि कवि 

मैं विद्रोही हूँ तो .......

मैं विद्रोही हूँ तो मुझे विद्रोही रहने दीजिये बेहतर होगा यही कि आप मेरी मनमर्जी मुझे करने दीजिये मैं नहीं बना हूँ आपकी दुनिया के लिए मुझे भाती नहीं कदापि ये नौटंकिया दुनियादारी की न कभी समझ में आते है ये बेहूदा टंटे जाति बिरादरी के लोग पीकर झूठी शराब अगर जी रहे है मस्ती में तो मुझे नहीं रहना ऐसी सोहबत में नशे में अंधे समाज को भला कोई क्या समझाएगा मानवता को जो रोज बेचते है अपने घटिया स्वार्थ के बाजार में ऐसे जिंदे मुर्दों के शहर में जीना जिदंगी कौन चाहेगा जहाँ पर दिन घुटन से बेचैन हो रातें काटती हो साँसों को एक अंधी दौड़ में दौड़ने वालों के बीच मुकाबला जहाँ चलता रहता है दिन रात कैसे मैं कहूँ खुद से कि ये ही जीवन है मेरे मन का सच तो ये है की मैं तुम्हारी तरह कैद में घुटी साँसों का सौदा नहीं कर सकता कुछ पाने के लिए खुद को बेच नहीं सकता इंसानियत हो.. प्रकृति हो.. या भावनाए जीवन की मैं कदापि इनसे खिलवाड़ नहीं कर सकता अगर ये सब विद्रोह है तो मेरा विद्रोह ही समझ लीजिये कुछ न पाकर सुकून से जीना ही मुझे कुबूल है ..... रवि कवि

ये नेता तो देश का चीरहरण पल पल कर रहा है

देश की राजनीति का चीरहरण नेता रूपी दुशासन हर रोज करता है मायावी ..छलावी हरकतों से मानवता पर कड़ा प्रहार करता है ना राम का कृष्ण का ना किसी धर्मं का यहाँ पर आचरण दिखता है ये तो रावण, कंस, शिशुपाल और शकुनी की तरह स्वार्थ की चालें चलता है हर रोज नए प्रपंच ठगने के शातिर होकर दांव चलता है खादी को बदनाम और माँ भारती का अपमान बेशर्म होकर करता है वोट और सिर्फ वोट से ज्यादा नहीं कीमत जिसके लिए इंसान की बे-हया होकर ये ढोंग रचता है राजनीति बेच बेच कर घर अपना और अपनों का भरपूर भरता है ईमानदारी को रोज अपने जूतें के तलवे से कुचलता है जिसे नहीं है परवाह बच्चों के भूख की उनके भविष्य की युवाओं के सपनो की सिर्फ और सिर्फ लूटना जिसका एकमात्र लक्ष्य रहता है सच तो ये है कि नेता का ये चरित्र दुशासन से भी ज्यादा दरिंदा है दुशासन ने तो एक बार ही चीरहरण किया था मगर ये नेता तो देश का चीरहरण पल पल कर रहा है मगर ये नेता तो देश का चीरहरण पल पल कर रहा है  .................रवि कवि

क्यों जन्मा ?

क्यों जन्मा ?  बेहतर होता.... रहता अगर अजन्मा ... क्या मिला लेकर जन्म कुछ भी तो ऐसा नहीं जो हो मन से सहन हर चीज़ एक सौदा है बात बात पर धोखा है कुछ करने की कोशिश अंत में टूटा सपना है सच की राह हमेशा बिना मंजिल की यात्रा है एक दूसरे की जेब पर सबकी पैनी नजर है चूना लगाने को हर कोई आतुर है रिश्तों का मतलब मजबूरी है जुआ, जुगाड़ और जूतमपैजार यही जिंदगी है यही जिंदगी है यही जिंदगी है ................ रवि कवि

ये विवशता - का रिश्ता कतई न हो .

अरे ! जो लूट ले दौलत  तो कोई ग़म न करो  गर लूट ले कोई विश्वाश तो  हरगिज़ न फिर पीछे मुड़ो  यूँ भी  जो दोस्ती को मौका बना ले  ये विवशता - का रिश्ता कतई  न हो ................रवि कवि 

जनता दो प्रकार की होती है

जनता दो प्रकार की होती है एक वो जो वोट डालती है और दूसरी वो जो वोट नहीं देती है जो जनता वोट देती है वो आमतौर पर गरीब, पिछड़ी हुई, नारकीय/ बदहाली में रहने वाली या गाँव या झोपड़ पट्टी में में रहने वाली, अनपढ़ या थोडा बहुत पढ़ी लिखी हुई जो कभी कभी थोडा बहुत लालच या वादों के लच्छों में उलझ जाने वाली, जाति या धर्म के नाम पर भी बहक जाने वाली जनता ........ जो धूप हो बारिश हो कैसा भी मौसम हो कितनी भी लम्बी लाइन हो कितना भी अन्य जरुरी काम हो सबकी परवाह किये बगैर वोट दिवस को उत्सव समझ वोट देने को घर से निकल ही जाती है पर जो जनता वोट नहीं डालती , अक्सर, ज्यादा पढ़ी लिखी, आर्थिक रूप से सबल, देश दुनिया के हालात से अच्छी तरह रूबरू रहने वाली, हर मुद्दे पर पर आक्रोश और प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाली विशेषकर ... राजनितिक व्यवस्था से जुड़े लोगो से लाभ लेने वाली जनता ..................... वोट देने की प्रवर्ती से कोसो दूर रहती है या दे भी दिया तो मानो बड़ा अहसान किया वैसी अकड़ का भी खूब परिचय देती है लेकिन ज्यादातर तो, काम जरुरी ना हो तो वोट दिवस को छुट्टी का दिन बना कर घुमने निकल जाने वाली जनता ही होती ह...

रहबरी का सहारा

कुछ रब का अहसान रहा मुझ पर कुछ तेरी रहबरी का सहारा मिला वर्ना जख्म के समंदर में डूबकर भी भला कोई जिन्दा रहा है कभी? लोगो ने तो बहुत कुछ किया पल पल रंग बदल बदल छाया को भी न बख्शा कभी जहाँ भी जैसी भी मिला मौका करतूत कोई रहने न दी पर उसकी मेहर और तेरा सिहराना जिन्दगी की ढाल बना रहा मैं हर दर्द को हर मर्ज को छोड़ आया जहाँ भी जैसे ही वो मिलते रहे आखिर यह भी कोई गले लगाने की चीज़ होते है भला ? जब मेरा रब मेरे साथ है और में अपने यार के करीब.................. रवि कवि

मैं किसान हूँ,

बस सितम दर सितम सहे जा रहा हूँ अपनों से दूरी बेगानों से शिकवा मिली घाव घेहरे होते रहे और दर्द से चीख उठती रही मगर फिर भी हाथ में हल लिए अपने खेतों पे जा रहा हूँ मैं किसान हूँ, अपनी माटी की खुसबू और अपनी फसलों से मोहब्बत में जिन्दगी से जुगलबंदी कर रहा हूँ टाट पैबंद के कपडे लपेटे सुबह से शाम सिर्फ मेहनत के भरोसे कर्तव्य अपना किये जा रहा हूँ मैं किसान हूँ, सूखी रोटी खाकर , खुद से खुद की झूटी तसल्ली दिलाकर क़र्ज़ के बिस्तर पे फटेहाल जिन्दगी से बदतर तकिये पे सर टिका कर रात भर अगले दिन की खबर के सपने बुने जा रहा हूँ मैं किसान हूँ, खुद के घर के चूल्हे में आग जले न जले मगर औरों के पेट की फिक्र में खुद के पेट में आग ही आग जला के तपे जा रहा हूँ काली रात जो कभी न सुबह देख पायेगी ऐसी जिन्दगी को जीकर पीकर सवाल बने जा रहा हूँ मैं किसान हूँ, कैसा इंसान हूँ लहुलुहान हूँ मगर लहू बहता हुआ दिखा नहीं सकता हाँ ! लेकिन औरो का पेट मेरे लहू की कीमत पर है भरता है और देखिये ये बिडम्बना कैसी है जो औरो के लिए तिल तिल पल पल मरता है उसकी जिन्दगी की कीमत जला हुआ कोयले से ज्यादा कुछ नहीं मैं किसान हूँ, मे...

सज गयी है महफ़िल

सज गयी है महफ़िल यार का दीदार होने को है बहुत रही पिछली जिन्दगी ग़ुरबत में अब मेहरबानी का सुरूर चढ़ने को है आ मिटा ले जिन्दगी से जिन्दगी की सब खताएँ , सब शिकवे हुस्न की बारिश और मुहब्बत का नशा अब यूँ ही रहे जिन्दगी भर साथ चलते चलते ... जिन्दगी भर .... बस यूँ ही ... हमेशा हमेशा ............. रवि कवि

तेरा मनमोहन करे पुकार..............................

सोनिया जी आ जाओ एक बार तेरा मनमोहन करे पुकार यहाँ दुविधा खड़ी अपार नहीं जमता कोई विचार बस आ जाओ जल्दी कर स्वास्थ सुधार ना सुबह बची ना रात मचा चारों और हाहाकार मेरे मंत्री निकले सब बेकार नहीं लगा पाए नय्या पार बस अब आप ही पर टिका है मेरा विश्वास जो कर सकती हो बेडापार सोनिया जी आ जाओ एक बार तेरा मनमोहन करे पुकार.............................. Ravi Kavi

इन इरादों को बदलने का तू सोच मत...

इन इरादों को बदलने का तू सोच मत नाव है तूफ़ान में, अफवाह पर यकीं मत कर ये दौर परिवर्तन को देखने को मचल रहा है जब तू अब ऐसे में कानून का - वक़्त का इंतज़ार मत कर देर तो पहले ही बहुत हो चुकी है अब और हुई तो क्रांति की चिंगारी का फिर सामना तू कर लेकिन सदियाँ तेरे नाम को बदनाम करें ऐसा कुछ ना हो वैसा प्रयास कर तू कर सकता है तू बदल सकता है मौका है केवल लोकतंत्र का ही नहीं तू दिलों का राजा बन सकता है बदल ले बदल ले आज हिंदुस्तान तुझमे हिंदुस्तान की आस्था का संबल देख रहा है .......रवि कवि

मेरी मजबूरी है

हमारा राजा .. राजा तो है मगर उसे कुछ नहीं मालूम होता बस हर घटना के बाद मासूमियत भरा चेहरा सजा के कुछ नहीं मालूम था मुझे या मेरी मजबूरी है रटा रटाया गाना सुना देता है अरे ... येस मैडम ... येस मैडम सिर्फ एक शब्द ही जिसकी डिक्सनरी में शुरू से लेकर आखिर तक छपा है वोह राजा काहे का राजा है लेकिन .... सच यह है कि कोई उसे बुरी तरह यूज कर रहा है और जानता तो वोह भी है सब कुछ कि गुनाह तो है जो वोह कर रहा है ...........रवि कवि

दो साल का रिचार्ज (बहुमत) बाकि है

कभी मजहब के नाम पर वोट की कमाई कभी मजहब की करके दुहाई बंटवारे की करना बुबाई क्या इन सबको ही करना सरकार समझती है देश की भलाई तो लानत है धिक्कार है शहीदों के खून का तिरस्कार है मगर अभी दो साल का रिचार्ज (बहुमत) बाकि है मेरे दोस्त इसलिए इनको कुछ भी कहना सुनना बेकार है ................ रवि कवि

भूख से बड़ी तेरे माँ बाप की उम्मीद है......

रात भर बच्चा भूख से रोता बिलखता रहा माँ बाप दिलासे से उसको समझाते रहे की बेटा रात कट जाने दे सुबह को आने दे कुछ बात जरुर बन जाएगी बस तू तब तक सब्र कर जानता हूँ की भूख असहनीय दर्द है मगर अभी तेरे माँ बाप के पास कुछ नहीं ये भी सच है उम्मीद के सहारे हम जिन्दा है और तू ही तो हमारी उम्मीद है चुप हो जा बेटा तेरी भूख से बड़ी तेरे माँ बाप की उम्मीद है.................. रवि कवि

तुझ संग प्रीत लगाईं है ..

दिल ही दिल में बात चली है साँसों ने ली अंगड़ाई है सागर कि लहरों सी तू शायद मुझ में ही कहीं समाई है पहनेगी तू कभी मेरी ही बाँहों का हार येही मुराद लेके मन में तुझ संग प्रीत लगाईं है .............. रवि कवि

आज वक़्त कितना बदल गया है अब...........

धमाके जो पहले रोंगटे खड़े देते थे दहशत से सारा माहौल भर देते थे क्या व्यबस्था क्या जनता सब के सब एक साथ खड़े होकर उस नाजुक वक़्त को संभाल लेते थे दर्द में हमदर्द हुआ करते थे पर आज वक़्त कितना बदल गया है अब अब व्यबस्था धमाको के साथ जीने की आदत डाल लेने का मंत्र सिखा रही है और जनता भी हर धमको के बाद केंडल मार्च लेके निकल पड़ती है सबकी जिम्मेवारी पूरी हो गयी और धमाके की कहानी खतम जिन्दगी जैसी थी फिर शुरू हो गयी............. रवि कवि