चले तो बहुत, पहुंचे कही नहीं, किया बहुत, पाया कुछ नहीं, जिन्दगी झोख कर भी पूरी, सुख चैन कभी मिला नहीं, अब संभल जाने का वक़्त है, जिन्दगी फिर नहीं मिलेगी, कुछ कर गुजरने की ठान अब, काम ऐसा कर, की जीवन हो सफल मेरा.... रवि कवि"
लोग कुछ भी कहें कुछ भी समझें यह हक़ है उनका पर हर बार जो वो समझें सही ही हो, ऐसा नहीं होता यूँ भी अश्लीलता देखने वालों की आँखों में होती है माँ जब दूध पिलाती है तो ममता छलकती है पत्नी जब अपने पति को प्रेम करती है तो सृष्टि की सृजनता होती है प्रेम का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए मगर एकांत में मधुर मिलन के भाव को समझना चाहिए यौवन जीवन की सच्चाई है प्रेम जीवन की सचाई है मन से मन का मिलन जितना ज़रूरी है उतना ही तनसे तन का मिलन भी ज़रूरी है अगर बिना कहे बात बनती होती तो कंडोम को इतने प्रचार की ज़रूरत कभी नहीं होती फिर भी आज की मीडिया से कहीं ज्यादा कविता में शरम है बात कहने के अंदाज़ में बड़ा फर्क है जो मीडिया रात दिन यह बताता है की कपड़े के अन्दर नंगा शरीर कैसा दिखता है वही बात एक कवि शरीर की खूबसूरती को बयान एकदम निराले अंदाज़ में करता है रही बात शब्दों में अपना भाव पिरोकर कहना हर कवि का अपना अंदाज़ होता हैं बस मन के भाव पहुँचाना ही कवि का संकल्प होता है व्यापार नहीं करता कवि न ही बिकाऊ मीडिया है कविता तो बस इतना चाहती है की समाज आगे बढ़े और शांत रहे और हर ओर खूबसूरती बिखरे बस इतना ही उसका मर्म ह...
कभी जिन्दगी कुछ उलझनों और कुछ शरारतों के बीच चलता हुआ कोई तूफान है कभी जिन्दगी धडकनों और लम्हों के बीच दौड़ती फिरती मुस्कान है कभी जिन्दगी तेरी या कभी मेरी रोज़ रोज़ बदलने वाली पहचान है और येही पहचान जिन्दगी की कहानी है जी ले इसे जैसी भी है जिन्दगी बस चलते रहने का नाम है चलते रहो बस चलते रहो.............................रवि कवि
दियें जलाये, उत्सव मनाये दिवाली है आई प्रेम और ख़ुशी के साथ नयी उमंग नयी उर्जा संग है लायी बरसती रहेगी सर्वदा माँ लक्ष्मी की कृपा सन्देश है ये लायी मंगल मंगल सब रहे सदा है आज दिवाली कहने आई ..................... रवि कवि
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