चले तो बहुत, पहुंचे कही नहीं, किया बहुत, पाया कुछ नहीं, जिन्दगी झोख कर भी पूरी, सुख चैन कभी मिला नहीं, अब संभल जाने का वक़्त है, जिन्दगी फिर नहीं मिलेगी, कुछ कर गुजरने की ठान अब, काम ऐसा कर, की जीवन हो सफल मेरा.... रवि कवि"
राजा डुगडुगी बजाता है जनता को नचाता है ऊँचे ऊँचे वादे करके सस्ते में टरकाता है मन की बात बहुत करता है काम की बात छिपाता है दुनिया का चक्कर लगा कर ढोल बड़े पिटवाता है कभी नोटबंदी है करता कभी जीएसटी में फंसाता है आर्थिक नसबंदी से भ्रस्टाचार को डराता है उत्पादन सब ठप्प पड़ा है और कारोबार हो गया सब चौपट पर राजा जी कहते है विकास हमारा है चौकस न खाऊंगा न खाने दूंगा नारा भी वो देते है लेकिन बस ये नारे है जो जनता को सुनाते है पंडाल के पीछे खाने वाले अब भी भरपूर मजे उड़ाते है बायोमेट्रिक के डंडे से काम सरकारी होने का भ्रम बखूबी जारी है असली लाल फीता शाही का राज अभी भी कायम है बेटी बचाओ की बात है करते पर असल में बेटों को बचाते है “ बेचारा बेरोजगार आज भी उम्मीद से खड़ा है उसी मुकाम पर जहाँ पर उसे भूतपूर्व राजा ने छोड़ा था” वन नेशन वन टैक्स तो कर ने सके पर “ वन नेशन वन गवर्नमेंट” पर दिल से काम जारी है सारी नदियाँ जुड़ गयी है कागज पर भ्रस्टाचार खतम हो गया वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पर अयोध्या में वर्षो बाद मनी...
मैं विद्रोही हूँ तो मुझे विद्रोही रहने दीजिये बेहतर होगा यही कि आप मेरी मनमर्जी मुझे करने दीजिये मैं नहीं बना हूँ आपकी दुनिया के लिए मुझे भाती नहीं कदापि ये नौटंकिया दुनियादारी की न कभी समझ में आते है ये बेहूदा टंटे जाति बिरादरी के लोग पीकर झूठी शराब अगर जी रहे है मस्ती में तो मुझे नहीं रहना ऐसी सोहबत में नशे में अंधे समाज को भला कोई क्या समझाएगा मानवता को जो रोज बेचते है अपने घटिया स्वार्थ के बाजार में ऐसे जिंदे मुर्दों के शहर में जीना जिदंगी कौन चाहेगा जहाँ पर दिन घुटन से बेचैन हो रातें काटती हो साँसों को एक अंधी दौड़ में दौड़ने वालों के बीच मुकाबला जहाँ चलता रहता है दिन रात कैसे मैं कहूँ खुद से कि ये ही जीवन है मेरे मन का सच तो ये है की मैं तुम्हारी तरह कैद में घुटी साँसों का सौदा नहीं कर सकता कुछ पाने के लिए खुद को बेच नहीं सकता इंसानियत हो.. प्रकृति हो.. या भावनाए जीवन की मैं कदापि इनसे खिलवाड़ नहीं कर सकता अगर ये सब विद्रोह है तो मेरा विद्रोह ही समझ लीजिये कुछ न पाकर सुकून से जीना ही मुझे कुबूल है ..... रवि कवि
जिन्दगी ने बहुत कुछ दिया, कुछ मन का और कुछ अपनी तरह का दिया रोज रोज हमने जिन्दगी को जिया ये सोच के जिया कि आने वाला पल बहुत खास होगा ऐसा होगा जहाँ सब कुछ मन का होगा यही आस लिए जिन्दगी रोज रोज प्रयास करती है जिन्दगी मेरी भी सबकी भी एक ही तरह से चलती है सपनो की ऊँची उड़ान हर रोज हमारे अरमान लिए उडती है और सुबह से शाम तक जिन्दगी न जाने कितने अजनबी तूफानों से लडती है आती है जाती है – ना जाने क्या क्या जिन्दगी करवाती है यही है जिन्दगी मेरी भी – तेरी भी – सबकी भी लेकिन फिर भी बहुत खुबसूरत अहसास है जीने का ये जब अपनों से जरा सा भी अपनापन जो मिल जाये मानो तेज दौड़ती जिन्दगी को सुकून की छाँव मिल जाये रिश्तों की महक से फिर जिन्दगी का खिल जाना दिल को असली सुकून देता है हम भी खास है .. ये अहसास देता है
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