चले तो बहुत, पहुंचे कही नहीं, किया बहुत, पाया कुछ नहीं, जिन्दगी झोख कर भी पूरी, सुख चैन कभी मिला नहीं, अब संभल जाने का वक़्त है, जिन्दगी फिर नहीं मिलेगी, कुछ कर गुजरने की ठान अब, काम ऐसा कर, की जीवन हो सफल मेरा.... रवि कवि"
देश की राजनीति का चीरहरण नेता रूपी दुशासन हर रोज करता है मायावी ..छलावी हरकतों से मानवता पर कड़ा प्रहार करता है ना राम का कृष्ण का ना किसी धर्मं का यहाँ पर आचरण दिखता है ये तो रावण, कंस, शिशुपाल और शकुनी की तरह स्वार्थ की चालें चलता है हर रोज नए प्रपंच ठगने के शातिर होकर दांव चलता है खादी को बदनाम और माँ भारती का अपमान बेशर्म होकर करता है वोट और सिर्फ वोट से ज्यादा नहीं कीमत जिसके लिए इंसान की बे-हया होकर ये ढोंग रचता है राजनीति बेच बेच कर घर अपना और अपनों का भरपूर भरता है ईमानदारी को रोज अपने जूतें के तलवे से कुचलता है जिसे नहीं है परवाह बच्चों के भूख की उनके भविष्य की युवाओं के सपनो की सिर्फ और सिर्फ लूटना जिसका एकमात्र लक्ष्य रहता है सच तो ये है कि नेता का ये चरित्र दुशासन से भी ज्यादा दरिंदा है दुशासन ने तो एक बार ही चीरहरण किया था मगर ये नेता तो देश का चीरहरण पल पल कर रहा है मगर ये नेता तो देश का चीरहरण पल पल कर रहा है .................रवि कवि
मैं विद्रोही हूँ तो मुझे विद्रोही रहने दीजिये बेहतर होगा यही कि आप मेरी मनमर्जी मुझे करने दीजिये मैं नहीं बना हूँ आपकी दुनिया के लिए मुझे भाती नहीं कदापि ये नौटंकिया दुनियादारी की न कभी समझ में आते है ये बेहूदा टंटे जाति बिरादरी के लोग पीकर झूठी शराब अगर जी रहे है मस्ती में तो मुझे नहीं रहना ऐसी सोहबत में नशे में अंधे समाज को भला कोई क्या समझाएगा मानवता को जो रोज बेचते है अपने घटिया स्वार्थ के बाजार में ऐसे जिंदे मुर्दों के शहर में जीना जिदंगी कौन चाहेगा जहाँ पर दिन घुटन से बेचैन हो रातें काटती हो साँसों को एक अंधी दौड़ में दौड़ने वालों के बीच मुकाबला जहाँ चलता रहता है दिन रात कैसे मैं कहूँ खुद से कि ये ही जीवन है मेरे मन का सच तो ये है की मैं तुम्हारी तरह कैद में घुटी साँसों का सौदा नहीं कर सकता कुछ पाने के लिए खुद को बेच नहीं सकता इंसानियत हो.. प्रकृति हो.. या भावनाए जीवन की मैं कदापि इनसे खिलवाड़ नहीं कर सकता अगर ये सब विद्रोह है तो मेरा विद्रोह ही समझ लीजिये कुछ न पाकर सुकून से जीना ही मुझे कुबूल है ..... रवि कवि
राजा डुगडुगी बजाता है जनता को नचाता है ऊँचे ऊँचे वादे करके सस्ते में टरकाता है मन की बात बहुत करता है काम की बात छिपाता है दुनिया का चक्कर लगा कर ढोल बड़े पिटवाता है कभी नोटबंदी है करता कभी जीएसटी में फंसाता है आर्थिक नसबंदी से भ्रस्टाचार को डराता है उत्पादन सब ठप्प पड़ा है और कारोबार हो गया सब चौपट पर राजा जी कहते है विकास हमारा है चौकस न खाऊंगा न खाने दूंगा नारा भी वो देते है लेकिन बस ये नारे है जो जनता को सुनाते है पंडाल के पीछे खाने वाले अब भी भरपूर मजे उड़ाते है बायोमेट्रिक के डंडे से काम सरकारी होने का भ्रम बखूबी जारी है असली लाल फीता शाही का राज अभी भी कायम है बेटी बचाओ की बात है करते पर असल में बेटों को बचाते है “ बेचारा बेरोजगार आज भी उम्मीद से खड़ा है उसी मुकाम पर जहाँ पर उसे भूतपूर्व राजा ने छोड़ा था” वन नेशन वन टैक्स तो कर ने सके पर “ वन नेशन वन गवर्नमेंट” पर दिल से काम जारी है सारी नदियाँ जुड़ गयी है कागज पर भ्रस्टाचार खतम हो गया वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट पर अयोध्या में वर्षो बाद मनी...
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